लेखक की कलम से: मन्दिर निर्माण से राम राज्य रूपी राष्ट्र निर्माण की ओर
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अखिल मोहन शर्मा
स्वतंत्र लेखक

अयोध्या में भव्य मन्दिर निर्माण को लेकर निधि समर्पण अभियान प्रारम्भ हो चुका है और लोग इसमें अपने सामर्थ्य से अधिक योगदान भी कर रहे है। जोकि अपने आप में ही एक विशेष अनुभूति है।इसी बीच अयोध्या घटनाक्रम एवं भगवान श्री राम के चरित्र से प्रेरणा लेने वाला एक लेख।

श्रीरामजन्मभूमि अयोध्या समूची दुनिया का एकमात्र ऐसा घटनाक्रम है जिसका न केवल ऐतिहासिक महत्व है बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं राजनीतिक प्रतिष्ठा से भी जुड़ा हुआ एक प्रसंग है।राम लला की जन्मभूमि में आक्रमण व उनके मन्दिर का विध्वंस विदेशी आक्रांताओं द्वारा किए गए उन ऐतिहासिक मुख्य अपराधों में से एक है जिनका उद्देश्य भारतीय संस्कृति एवं धर्म को लक्षित कर समाज को तोड़ना और अपना दमनकारी शासन चलाना रहा है।

खैर,अब सैंकडो वर्षों की जद्दोजहद, आंदोलनो, अनुरोधों व असंख्य बलिदानों एवं पूर्ण न्यायिक प्रक्रिया के पश्चात वह स्वप्न पूर्ण होने जा रहा है जिसको देखते-देखते सदियां बीत गई, दर्जनों पीढ़ियां इस आशा में गुजर गई। आखिरकार विश्व इतिहास में सत्य एवं धर्म की विजय का वह अविस्मरणीय पल आ गया है जब भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार केंद्र सरकार द्वारा गठित न्यास को जो मन्दिर निर्माण की जिम्मेदारी दी गई थी, उसकी ऐतिहासिक शुरूआत 5 अगस्त को भूमि पूजन के माध्यम से हुई।



5 अगस्त को रखी जाने वाली वह नींव न केवल भव्य मन्दिर के निर्माण के लिए थी अपितु उन दुष्ट आक्रांताओं की करतूतों को समाप्त करने की भी एक पहल है। जोकि पूरे भारत में शुरू होनी चाहिए। दूसरी ओर यह नींव वर्तमान एवं भविष्य की भावी पीढ़ियों के लिए समग्र जगत के वास्तविक आदर्श मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम से प्रेरित विचारों की आधारशिला का भी काम करेगी। जिसका राम जी की अयोध्या रूपी खुशहाल भारत के निर्माण में अहम योगदान होगा, बशर्ते जरूरत है तो ऐसे अवतार के गुणों को व्यवहार में लाने की।

क्योंकि भगवान श्री राम केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि हर एक दृष्टिकोण से एक ऐसा आदर्श चरित्र हैं जिनके व्यक्तिव में नेतृत्व, प्रशासन, उद्यमशीलता, प्रबंधन जैसे वो असंख्य गुण समाहित है जिससे न केवल स्व-कल्याण या मानव कल्याण हो सकता है अपितु पूरी सृष्टि को प्रफुल्लित किया जा सकता है।

इसलिए आज जहां पूरी दुनिया इस बात को स्वीकृति प्रदान करती है कि 21 वीं सदी भारत की है और दूसरी ओर कोरोना के काल ने भी स्वावलंबन की उपयोगिता को पूर्ण रूप से सिद्ध कर दिया है। ऐसे समय में हमें भगवान श्री राम के चरित्र से सीखना चाहिए कि किस प्रकार उन्होंने सीमित संसाधनों को योजनाबद्ध तरीके से प्रयोग कर वन में होते हुए भी मात्र बानर सेना के सहयोग से लंका पर विजय प्राप्त कर ली। ठीक उसी प्रकार हमको भी सीमित संसाधनों के होने पर हताश नहीं होना चाहिए बल्कि राम जी की भांति ही अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए। आज जब हम प्रगतिशील राष्ट्र के रूप में आगे बढ़कर प्रतिदिन नव कीर्तिमान दुनिया के समक्ष स्थापित कर रहे है। वो चाहे नई शिक्षा नीति हो, आत्मनिर्भर भारत के लिए हर क्षेत्र से प्रयास हो, कला-संसकृति हो, ज्ञान-विज्ञान हो, सैन्य ताकत हो,उद्यमशीलता होया अभी हाल ही में शुरू हुआ व्यापक कोरोना टीकाकरण अभियान हो या अन्य कोई भी क्षेत्र हो जहां कहीं भी हम समग्र विश्व की प्राचीन अवधारणाओं को तोड़कर नए एवं युवा भारत का परिचय दे रहे है।
तो वहीं इसी बीच हम और हमारा समाज भ्रष्टाचारी, बेईमानी, छल व हिंसा से ग्रसित है। एक प्रकार से आज हम कहीं न कहीं भारी नैतिक संकट का भी सामना कर रहे है।

और ऐसा कभी भी संभव नहीं हो सकता की भारत जैसी प्राचीनतम सभ्यता दुनिया के सामने केवल अपनी विकसित छवि ही बनाने के लिए प्रयासरत हो। इसलिए दुनिया भर में वास्तविक आदर्श बनने के लिए हमें सत्यता, अखंडता एवं ईमानदारी के सिद्धांतो को हमारे समाज में पुनः जीवंत करने की आवश्यकता है। यह वहीं सब उच्च नैतिक मूल्य, मानक है जो भगवान श्री राम के चरित्र में विद्मान है और हमें उनको अपनाने की आवश्यकता है।

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