नई दिल्ली : गाड़ी में पेट्रोल भरवाते समय अक्सर लोग केवल मीटर और कुल रुपये ही देखते हैं, लेकिन उसमें कितना इथेनॉल (10% या 20%) मिला है, यह जानने का कोई सीधा तरीका उपभोक्ता के पास नहीं होता। इसी मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका दायर की गई है, जिस पर जस्टिस एम एम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ सुनवाई करेगी।
याचिका में की गई प्रमुख मांगें:
नोजल और बिल पर स्पष्टता: पेट्रोल पंप के नोजल और फ्यूल इनवॉइस (रसीद) पर इथेनॉल का प्रतिशत (जैसे E10 या E20) साफ और आसानी से पढ़े जाने योग्य शब्दों में लिखा जाए।
सार्वजनिक व्हीकल डेटाबेस: सरकार और संबंधित एजेंसियां एक आधिकारिक ऑनलाइन डेटाबेस बनाएं, जहां वाहन निर्माता, मॉडल, इंजन प्रकार और निर्माण वर्ष डालकर यह जांचा जा सके कि गाड़ी E20 के अनुकूल है या नहीं।
विशेषज्ञ समिति की जांच: पेट्रोलियम व सड़क परिवहन मंत्रालय, BIS और ऑटोमोबाइल इंजीनियरों को मिलाकर एक स्वतंत्र कमेटी बनाई जाए। यह कमेटी केवल लैब टेस्ट नहीं, बल्कि सड़कों पर चल रहे अलग-अलग उम्र के वाहनों पर E20 के प्रभाव, माइलेज, मेंटेनेंस कॉस्ट और पर्यावरण पर पड़ने वाले असर की रिपोर्ट तैयार करे।
विकल्प और ट्रांजिशन प्लान: जो गाड़ियां E20 ईंधन के अनुकूल नहीं हैं, उनके लिए पारदर्शी ट्रांजिशन फ्रेमवर्क बने और जहां संभव हो, कम इथेनॉल वाला ईंधन (Low Blended Fuel) उपलब्ध कराया जाए।
पुराने वाहन मालिकों की चिंता
अप्रैल 2023 के बाद बने वाहन (BS6 Phase-2) E20 मानकों के अनुरूप हैं। हालांकि, इससे पहले खरीदे गए लाखों वाहन—जो महज 3 से 4 साल पुराने हैं और बेहतर स्थिति में हैं—को लेकर संशय बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई से तय होगा कि उपभोक्ताओं को ईंधन संबंधी कितनी पारदर्शिता मिलेगी और पुरानी गाड़ियों के लिए क्या वैकल्पिक व्यवस्था होगी।