नई दिल्ली : बांग्लादेश की एक ट्रिब्यूनल अदालत ने सोमवार को बड़ा फैसला सुनाया. अदालत ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान कमाल को मौत की सजा दी. यह सजा उन्हें 2024 के जुलाई-अगस्त के बीच हुए छात्र आंदोलन के दौरान मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए दी गई है.
हालांकि, इस केस के तीसरे आरोपी और पूर्व पुलिस प्रमुख चौधरी अब्दुल्ला अल-मामून को मौत की सजा नहीं दी गई. उन्हें सिर्फ 5 साल की जेल हुई, क्योंकि उन्होंने अपनी गलती मान ली और सरकार की तरफ से गवाह बनकर केस में मदद की.
शेख हसीना फिलहाल भारत में निर्वासन (एक्साइल) में रह रही हैं और उन्होंने अदालत के सामने पेश होने से इनकार कर दिया है. वहीं असदुज्जमान खान भी फरार हैं. लेकिन अल-मामून इस वक्त जेल में हैं.
कैसे बची पूर्व पुलिस प्रमुख की जान?
चौधरी अब्दुल्ला अल-मामून ने अदालत में अपनी गलती मान ली थी और कहा था कि वे सरकार की ओर से गवाह बनना चाहते हैं. जुलाई में इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल-1 ने उनकी याचिका मान ली थी और उन्हें सरकारी गवाह बनने की इजाज़त दे दी थी.
मुख्य अभियोजक मोहम्मद ताजुल इस्लाम ने बताया कि अदालत में मामून से पूछा गया था कि क्या वे अपने ऊपर लगे आरोपों को मानते हैं. इसके जवाब में उन्होंने कहा, "हां, मैं आरोप स्वीकार करता हूं और सच्चाई सामने लाने में अदालत की मदद करना चाहता हूं."




