हाल के दिनों में फैली अफवाहों में दावा किया गया कि यह धुंध ईरान में रिफाइनरी स्ट्राइक से निकले धुएं या केमिकल फॉलआउट से जुड़ी हो सकती है.
नई दिल्ली : दिल्ली मौजूदा वक्त बसंत का है और शहर में गर्मी की आहट महसूस की जा रही है. इसी बीच, अचानक धुंध की वापसी हो गई, जो बिल्कुल उसी तरह नजर आ रही है, जैसी स्थिति कड़ाके की ठंड में होती है. दिल्ली-NCR में छाई घनी धुंध ने सोशल मीडिया पर अटकलों को हवा दे दी है. कुछ यूज़र्स का दावा है कि यह रिफाइनरी स्ट्राइक और ईरान के कुछ हिस्सों में हुई 'पेट्रोल रेन' से जुड़ा हो सकता है.
हालांकि, मौसम के जानकारों का मानना है कि उत्तर भारत में इस घटना का एक ज़्यादा लोकल और जाना-पहचाना कारण है, जो आस-पास के सूखे इलाकों से तेज़ हवाओं के साथ आने वाली धूल से जुड़ा है.
दिल्ली पर क्या मंडरा रहा?
Skymet Weather में मौसम विज्ञान और क्लाइमेट चेंज के वाइस प्रेसिडेंट महेश पलावत के मुताबिक, दिल्ली-NCR पर अभी जो धुंध है, वह तेज़ पश्चिमी हवाओं के साथ आने वाली धूल की वजह से है.
ये हवाएं पाकिस्तान के बलूचिस्तान और थार रेगिस्तान से बड़ी मात्रा में धूल के कण ला रही हैं, ये दोनों ही सूखे और तेज़ हवाओं वाले मौसम में धूल भरे तूफ़ान के जाने-माने सोर्स हैं.
पलावत ने बताया, “जब इन रेगिस्तानी इलाकों में हवाएं तेज़ होती हैं, तो ढीली रेत और धूल एटमॉस्फियर में उठ जाती हैं और सैकड़ों किलोमीटर तक जा सकती हैं. मौजूदा मौसम के पैटर्न ने इन धूल भरी हवाओं को दिल्ली-NCR सहित उत्तर-पश्चिमी भारत की ओर मोड़ दिया है."
दिल्ली में कम विज़िबिलिटी...
धूल के कण भूरे या ग्रे रंग की धुंध बनाते हैं, जिससे विज़िबिलिटी कम हो जाती है और आसमान धुंधला दिखता है. हालांकि, ऐसी धुंध पॉल्यूशन स्मॉग जैसी हो सकती है, लेकिन यह ज़्यादातर इंडस्ट्रियल एमिशन के बजाय नैचुरल मिनरल डस्ट से बनी होती है.
हाल के दिनों में फैली अफवाहों में दावा किया गया कि यह धुंध ईरान में रिफाइनरी स्ट्राइक से निकले धुएं या केमिकल फॉलआउट से जुड़ी हो सकती है. यह भी दावा किया गया है कि इस इलाके में 'पेट्रोल रेन' असामान्य एटमोस्फेरिक कंडीशन के लिए ज़िम्मेदार थी.
दावों पर क्या कहते हैं जानकार?
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि ये दावे साइंटिफिक रूप से गलत हैं. पलावत ने कहा, “ईरान में रिफाइनरी स्ट्राइक से निकले धुएं के इतनी लंबी दूरी तय करने और सीधे दिल्ली पर धुंध बनाने का कोई मौसम संबंधी रास्ता नहीं है. एटमोस्फियर और मौजूदा हवा की दिशाएं ऐसी स्थिति का समर्थन नहीं करती हैं."
इसके बजाय मौसम मॉडल रीजनल डस्ट ट्रांसपोर्टेशन की ओर इशारा करते हैं, जो उत्तर भारत में एक आम बात है, खासकर सर्दियों के आखिर और गर्मियों की शुरुआत में जब पाकिस्तान और पश्चिमी भारत के रेगिस्तानी इलाकों में सूखे हालात रहते हैं.
मौसम बताने वालों के मुताबिक, अच्छी खबर यह है कि यह धुंध अस्थायी है. हवा के पैटर्न में बदलाव से धूल धीरे-धीरे छंटने की उम्मीद है. पलावत ने कहते हैं, “एक बार जब हवा की स्पीड बदलेगी और एटमोस्फेरिक मिक्सिंग बेहतर होगी, तो धूल बैठ जाएगी या हट जाएगी. अगले दो दिनों में हालात साफ होने लगेंगे.”